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अध्यात्म की शुरुआत 

अध्यात्म हमारे भीतर की वह चेतना है जो की निष्काम है उसी चेतना को जगाने का प्रयास ही  अध्यात्म  कहलाता।  मनुष्य जन्म कई लाख योनियों में जन्म लेने के पश्चात मिलता है इस जन्म की सार्थकता को प्रत्येक व्यक्ति नहीं समझते और भोग - विलास की प्रवृत्तियों में जीवन का सम्पूर्ण भाग निकल देते है वे भूल जाते है की शरीर नश्वर है जो अमर है वो है आत्मा। जीवन एक प्रक्रिया है इस धरती पर जन्म के साथ ही यह शुरू हो जाती है और अटल सत्य मृत्यु के साथ ख़त्म चाहे वो राजा हो या रंक  प्रकृति किसी के साथ भेदभाव नहीं करती।
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अध्यात्म 

सूर्य की रौशनी सबपर एक सामान भाव से पड़ती है , वायु का प्रवाह भी सामान ही होता है , यहाँ कुछ भी वास्तविक नहीं है जिसके पीछे हम अपना समय नष्ट करते है जिस सुख के पीछे हम दिन रात भागते है वो शारीरिक और क्षणिक है , वास्तविक सुख का अनुभव हमारी आत्मा को होता है। किसी नगर में एक बार कुछ लोग सड़क  पे चले जा रहे थे उनको देख कुछ और उनके पीछे चलने लगे सबको लगने लगा की अवश्य ही कुछ विशेष बात है इस प्रकार भीड़ अत्यधिक बढ़ गई अंत में पता चला की वे लोग इस शहर में नए थे और मार्ग से विचलित हो गए थे उनका अनुशरण करने वाले हजारो लोगो का समय और ऊर्जा बिना किसी बात के ही व्यर्थ चला गया।  कुछ लोग ऐसे भी थे जो समझदार थे और वे अपने नित्य के कामो में ही लगे  रहे। कहने का तात्पर्य ये है की यदि समाज का बड़ा वर्ग या पूरा समाज ही गलत दिशा अर्थात भौतिक सुख के पीछे भाग रहा है तो ये आवश्यक नहीं की हम भी उसके पीछे भागे।  वर्तमान समय में राजनीति ,सत्ता ,धन और भौतिक सुख के पीछे भागने वालो की संख्या सर्वाधिक है पर क्या वे मानसिक रूप से सुखी है ? 

भारतीय समाज में भी वैदिक काल से ही पुरुषार्थ की धारणा चली आ रही है जिसके अंतर्गत पुरुषार्थ  करते हुए जीवन व्यतीत करने वाला पुरुष ही सर्वोत्तम होता है।  पुरुषार्थ के अंतर्गत चार श्रेणियाँ होती है धर्म , अर्थ ,काम ,और मोक्ष। अंतिम मोक्ष की प्राप्ति है जिसमे जीवन के अंत काल में सर्वस्य त्याग कर ईश्वर की भक्ति में लीन  होते हुए  अपने अंश को ईश्वर के अंश में समाहित करना है। 

बचपन से लेकर जवानी और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक जीवन चक्र अलग अलग अवस्थाओं से गुजरता है।  जहां हम इस मोह रूपी संसार के मायाजाल में फंसकर अनर्गल कार्यो में ही जीवन का वास्तविक सुख और उद्देश्य दोनों ही भूल जाते है। अध्यात्म वही चेतना है जो हमें वास्तविक सुख के प्रति जागृत करती है।  मन से तमाम तरह की बुराइयों को निकाल बहार फेंकती है जिससे एक स्वच्छ मन में ईश्वर का वास हो सके और हमारे और हमारे सर्वशक्तिमान परम पिता के बीच अटूट संपर्क स्थापित हो सके यही अध्यात्म की शुरुआत है बाकी बाते अगले अंश में........ 
              
 अगला भाग -  

आध्यात्मिकता -  जीवन की आवश्यकता

 

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