kamal haasan and arvind kejriwaal



कमल हासन और अरविन्द केजरीवाल  - 


kamal haasan and arvind kejriwaal
kh and ak  



कमल हसन की अदाकारी का मैं बड़ा फैन रहा हूँ ,उनकी चाची  420 बचपन के दिनों से ही मेरी पसंदीदा फिल्मो में से एक रही है।  उस समय कम  फिल्मे ही होती थी जिनमे बच्चो और बड़ो दोनों को कॉमेडी में मजा आता था।एक इंसान कैसे अपनी शादी को बचाने के लिए औरत का वेश धारण करता था वो भी उम्र दराज औरत का कमल हसन ने उसे बखूबी निभाया था ,फिल्म में छोटा  सा सन्देश जातिगत भेदभाव को लेकर भी था। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ  की कमल हसन ने बतौर बाल कलाकार ६ वर्ष की उम्र में फिल्मो में कदम रखा था फिल्म का नाम था कलत्तुर कन्नमा। कमल हसन को कराटे और भरतनाट्यम का बखूबी ज्ञान है। जो की उन्होंने अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही ले लिया था। 
कमल हासन के नाम पदमश्री से लेकर चार बार राष्ट्रिय और अलग - भाषाओं में 19 फिल्मफेयर पुरस्कार मिल चुके है। उन्होंने खुद को पुरस्कारों से दूर रखने की घोषणा भी की थी. फिर भी २०१४ में उन्हें पदमविभूषण से सम्मानित किया गया। कमल हासन हे राम जैसी फिल्मो का निर्देशन भी कर चुके है जो गांधी जी की हत्या पर आधारित था और जिसमे शाहरुख़ खान ने काम किया था। कमल हासन अपनी पारिवारिक जिंदगी की वजह से भी काफी विवादित रहे कारण उनके अन्य अभिनेत्रियों से प्रेम - संबंध और  और कई शादिया रही है।  

हाल के दिनों में कमल हासन अपनी नई  पार्टी  को लेकर फिर चर्चा में है और उससे ज्यादा चर्चा आम आदमी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को अपनी पार्टी के स्थापना के अवसर पे बतौर मुख्य अतिथि बनाकर।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी भी इधर कुछ दिनों से समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाई हुई है वजह है आप विधायक अमानतुल्लाह खान और उनके अन्य सहयोगियों द्वारा दिल्ली के  मुख्य सचिव की पिटाई. आम आदमी पार्टी के विधायकों पे मारपीट का ये कोई पहला मामला नहीं है ऐसे मामलो की पूरी फेहरिश्त पड़ी हुई है। केजरीवाल भारतीय सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा मजाक का पात्र बनने वाले किरदार बन चुके है ,उनकी खांसी से लेकर हर गतिविधि पर सोशल मीडिया में अनेक चुटकुले और कहानिया मिल जाएंगे. 


ऐसे में कमल हासन ने उन्हें अपनी पार्टी के स्थापना के अवसर पर बुलाकर सोशल मीडिया को एक और मसाला दे दिया है। अरविन्द केजरीवाल ने कमल हासन को क्या सलाह दी होगी  इस पर  अभी से  सोशल मीडिया में अनेक कमेंट उपलब्ध है। 

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के हालियां दिनों में रजनीकांत और कमल हासन दक्षिण भारत के दो ऐसे अभिनेता है जिन्होंने अपनी पार्टी बनाई है। आप को बता दूँ की दक्षिण भारत में अभिनेताओं द्वारा पार्टी बनाने का प्रचलन काफी पुराना है इसका कारण है की दक्षिण भारत में फिल्मो के सुपर स्टार का विशेष दर्जा है क्योंकि  उनके फैन उनके कट्टर समर्थक होते है इसीलिए दक्षिण भारत की फिल्मो में किसी न किसी सामाजिक मुद्दे खासतौर पे बिल्डर ,माफिया ,मंत्री ,साहूकार ,ज़मींदार या दुष्ट राजा द्वारा प्रजा का उत्पीड़न दिखाया जाता है और हीरो किसी सुपर मैन जैसा आकर उनसे लड़ता है और उन्हें उनके कष्टों से मुक्ति दिलाता है। हीरो को परोपकारी और समाज का हित करने वाला दर्शाया जाता है।  यही कारण है की जनता सुपर स्टार से अपनापन महसूस करने लगती है और उसकी दीवानगी अपने स्टार के प्रति जूनून में बदल जाती है , इसका उदाहरण दक्षिण भारतीय शादियों में सुपर - स्टार और राजनेताओ के लगने वाले बड़े - बड़े पोस्टर और फिल्म की रिलीज पर उनके पोस्टरों की पूजा करना है. 

परन्तु ऐसा सारे सितारों के साथ नहीं होता , कुछ चुनिंदा ही ऐसे है जिनके समर्थक  पुरे राज्य में होते है यही कारण है की चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियां इन्हे अपने पक्ष में करने के लिए  प्रयासरत रहती है। और ये सुपर - स्टार भी इसका भरपूर लाभ लेते है कई स्टार सत्ता का केंद्र बिंदु बनने की लालसा से अपनी नई  पार्टी ही बना लेते है ताकि वे सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पे ही काबिज हो जाये।  सितारों से मुख्यमंत्री बनने का सबसे बड़ा उदहारण जयललिता का था। 


जबकि उत्तर भारत में ऐसा नहीं हो पाता  सितारों के प्रशंसक  चुनाव में उन्हें ही जितवा दे यही बहुत है। कमल हसन ने अरविन्द केजरीवाल को बुलाकर दक्षिण भारतीय जनता को अच्छा सन्देश नहीं दिया है केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी इस समय भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विवादित पार्टी है , एक विवाद ख़तम नहीं होता की दूसरा शुरू हो जाता है  और केजरीवाल की छवि एक ऐसे अभिनेता की है जिसका झूठ बोलने और यू टर्न  लेने में कोई सानी  नहीं है।  मुझे लगता है की शायद किसी ने कमल हासन को इस बात की ग़लतफ़हमी पैदा कर दी है की अरविन्द केजरीवाल  आज भी युवाओ की पहली पसंद है तो कमल हासन ने शुरूआती दौर में ही अपनी पार्टी की जड़ो पे कुल्हाड़ी चलाने का काम किया है बाकी आने वाले समय में होने वाले चुनाव ही बताएँगे की भारतीय राजनीति में कमल हासन की पार्टी का भविष्य क्या होगा .   


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आम आदमी पार्टी

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अगर कहा जाये की कम  समय में किसी पार्टी का सबसे ज्यादा विवादों से नाता रहा हो तो वो है आम आदमी पार्टी।  आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के समय से ही विवादों में रही है।  अन्ना के आंदोलन में अरविन्द केजरीवाल का शामिल होना और उस आंदोलन के माध्यम से जनता को अपनी उपस्थिति का अहसास करना ही अरविन्द केजरीवाल की शुरूआती रणनीति थी जिसमे वे सौ प्रतिशत कामयाब हुए।  उन्होंने आम जनता पे अपनी छाप छोड़ने के लिए आम जनता की वेशभूषा और और रहन - सहन पे विशेष ध्यान दिया ,जिसमे स्टेशन में अखबार बिछा के सोने से लेकर ठण्ड के दिनों में मफलर पहनने तक सब - कुछ शामिल था।  मैंने इतिहास की किताब में पढ़ा था की गांधी जी अपने शुरुआती दिनों में जब भाषण देने जाते तो कोट और पैंट  धारण किया करते थे। एक बार जब उन्होंने एक सभा में वस्त्र के विषय में टिपण्णी की तो उन्हें प्रथम स्वयं के वस्त्रो का ज्ञान हुआ उन्हें लगा की जबतक आम आदमी की वेशभूषा नहीं धारण करते तब तक  आम आदमी उनसे जुड़ाव नहीं महसूस कर सकता उस समय धोती भारत में पुरुषो की प्रमुख परिधान हुआ करती थी परन्तु उसमे भी कई किस्म थे जो की अत्यंत महंगे थे ,चरखा एक प्रसिद्ध वस्त्र  उत्पादक यंत्र था जो की घर - घर में उपलब्ध था। इसलिए गांधी जी ने निश्चय किया की वे खुद के चरखे से बनाया हुआ धोती ही पहनेंगे व वही उनका एक मात्र वस्त्र होगा। क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में जहा की अधिकाँश जनता गरीबी में अपना जीवन यापन करती है और जिन्हे तन पे लपेटने हेतु पूर्ण वस्त्र भी उपलब्ध नहीं है वहा वह कैसे पूर्ण वस्त्र पहन सकते है। 

हालांकि अरविन्द केजरीवाल और गांधी जी में दूर दूर तक कोई समानता नहीं है फिर भी आम जनमानस को वस्त्र से जुड़े इस तथ्य को जानना आवश्यक है। और जो लोग गांधी जी को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़ा किये रहते है उनसे मैं इतना ही कहना चाहूंगा की एक बार फेसबुक और व्हाट्सअप छोड़ के इतिहास की प्रामाणिक किताबों का अध्ययन करले। 
अन्ना के आंदोलन में अरविन्द केजरीवाल के साथ उनका एन जी ओ - इंडिया अगेंस्ट करप्शन भी सुर्खियों में था इसके नाम ने भी जनता पर सकारात्मक असर डाला मोदी  के उदय की संभावना को इस आंदोलन ने जैसे रोक ही दिया था और इसका सारा श्रेय भुनाने में अरविन्द केजरीवाल सफल हुए।  उन्होंने कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों को एक जैसी बताया उनकी बातों में आम आदमी की झलक मिली और उन्होंने इसी नाम से पार्टी की स्थापना की घोषणा करदी। 

हालांकि अन्ना ने उनकी मंशा पे शंका जाहिर की परन्तु फिर भी वे अन्ना को विश्वास में लेने में कामयाब हुए।  उन्होंने अपनी पार्टी और उसके प्रतिनिधियों के विषय में राजनीति से इतर बातें की और आम आदमी से दिखने वाले चेहरे को उम्मीदवार बनाया और खुद भी खड़े हुए चुनावों में पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला पर पार्टी ने उम्मीद से ज्यादा सीट हासिल की दिल्ली का चुनाव होने के कारण सन्देश देश के कोने - कोने में गया। 
बीजेपी  के हाथ से लोकसभा चुनाव खिसकते हुए दिखाई दिया। परन्तु कहते है सत्ता  अच्छे - अच्छो का मतिभ्रम कर देती है। और अरविन्द केजरीवाल  ने कांग्रेस से समर्थन लेकर जनता को आप की नीयत और अरविन्द केजरीवाल की कथनी और करनी के विषय में सोचने पे मजबूर किया क्योंकि कांग्रेस के समर्थन का प्रश्न पूछे जाने पर अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चो तक की कसमे  खा ली थी।  लोकसभा चुनाव में हुई हार से जल्द ही उन्हें इस बात की समझ आ गई और उन्होंने 45 दिनों में अनिल कपूर के नायक फिल्म की तरह एक बार फिर अपनी छाप जनता पर छोड़ी और 45 दिन बाद कांग्रेस को भी छोड़ दिया।  उनके कामो से दिल्ली  के निचले तबके के लोगो ने पुलिस और प्रशासन के उत्पीड़न से राहत महसूस किया और अगली बार उनको एक बार फिर दिल्ली का ताज सौंप दिया। 

परन्तु सत्ता और लालच   के खेल में अरविन्द केजरीवाल के विधायक से लेकर मंत्री तक  लगातार विवादों में बने हुए है। दूसरो पे आरोप लगाने वाली पार्टी  पे इस समय एक के बाद एक इतने आरोप है की पिछ्ला आरोप छोटा पड़ जाये और यदि यहां उन आरोपों का जिक्र किया जाए तो शायद कई पृष्ठ लग जाए। फिलहाल ताजा आरोपों में २० विधायकों का निलंबन और इन सीटों पर होने वाले चुनाव ही आप पार्टी का राजनीतिक भविष्य तय करेंगी की पार्टी पर जनता का विश्वास कितना बना हुआ है।  

इन्हे भी पढ़े - narendra modi vs rahul gandhi

mudaa and life


      मुद्दा और ज़िन्दगी 


                           
mudda
रायजी 


  • Kya hua fir raat ho gai Bina kisi baat ki.mudde wo nahi rahte jinse Zindagi aasan hoti hai.mudde wo rahte Hai jinke hone se Zindagi aasan ho jayegi.jo kabhi pure nahi hote.

  • mudde he to Hai hamari Zindagi me Baki Zindagi kaha bachti hai ab.paida hue tab se mudde suru ho jate Hai marne ke baad bhi mudde peechha nahi chhodte ab Mahatma Gandhi se leker Nehru tak ko dekh lijiye.bechare Mahatma Gandhi ki murder ki file dubara khul rahi Hai.nehru ke decision ko galat sahi bataya ja Raha Hai per apne kuch nahi Kiya ja Raha Hai.koi pappu ban baitha to koi fenku per enke siwa koi gental man bhi to nahi dikhai deta maidan me.kaam to enhi se chalana padta Hai bechari Bharat MAA ko.aakhir koi n koi mudda to chahiye jeene ke liye.aur.......



  • .हम भारत के लोग

gorakhpur to lucknow

gorakhpur to lucknow
गोरखपुर से लखनऊ 

गोरखपुर से लखनऊ 


स्टेशन  पे गाड़ी की सीटी के साथ ही मेरी ट्रेन भी   धीरे - धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी। घर से बाहर ये मेरा पहला कदम था कारण लखनऊ में मेरा एडमिशन एक इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ था और कल उसकी रिपोर्टिंग है। घर पे अकेले होने और पिता जी की तबियत ख़राब होने के कारण गोरखपुर से लखनऊ तक का सफर मुझे अकेले ही तय करना पड़ा। पारिवारिक स्थिति ठीक न होने के कारण सबकी उम्मीदे मुझी से थी। फिलहाल ट्रेन के जनरल कम्पार्टमेंट में सवार मैं खड़ा - खड़ा ही अपने भविष्य  के सपने बुनने में व्यस्त था तभी पीछे से किसी  की आवाज आई पीछे मुड़के देखा तो एक लड़की आगे बढ़ने का रास्ता मांग  रही थी। 

काली आँखे ,गुलाबी गोरापन और सुंदर मुखड़े को मैं अनायास ही   ध्यान से देखने लगा उसके चेहरे की सादगी देख के अचानक मुझे लगा की जैसे ज़िन्दगी कुछ कह रही है और मैं ध्यान से सुन रहा हूँ मैं उसको रास्ता देते हुए  किनारे   हो  गया।  अब तो गोरखपुर से लखनऊ का सफर सुहाना सा लगने लगा था। दिल में एक अलग ही उमंग थी कई तरह के सपने भी देखने चालू हो गए। थोड़ी देर बाद वो लड़की वापस आई और बगल से होते हुए मेरे पीछे वाली सीट पे ही बैठ गई ,शायद मैंने पहले पीछे मुड़  के देखा ही नहीं था नहीं तो पहले ही  उसे देख लेता खैर अभी ट्रेन की रवानगी हुए कुछ ही समय हुआ था।  फिर तो मैंने भी अपनी दिशा बदल ली और अपनी नजरे उसकी ओर कर ली , कई बार हमारी नजरे आपस में टकराई पर उन नजरो में नजाकत और शराफत दोनों ही भरी हुई थी और लग रहा था साथ में कुछ अलग एहसास की शुरुआत भी हो रही थी शायद यही पहली नजर का  प्यार है।

 बस्ती  स्टेशन पे कुछ सवारियों के उतरने से मुझे उसके सामने वाली ही सीट मिल गई  मुझे लगा जैसे ईश्वर ने मेरी मुराद ही पूरी कर दी अब वो मेरी नजरो के ठीक सामने ही थी। इशारो ही इशारो में मुझे पता चला की वो भी अपनी मौसी के साथ लखनऊ ही जा रही थी और लखनऊ  में अपनी मौसी के साथ रहकर यूनिवर्सिटी से बी काम प्रथम वर्ष की छात्रा थी। 

उसकी मौसी बहुत ही कड़क मिजाज की थी इसलिए वार्तालाप का माध्यम इशारा ही  था। लखनऊ आते आते हमने एक दुसरे का पता ले लिया था जिससे की हम मिल सके ,लखनऊ स्टेशन पहुंचने पे ऐसा लगा जैसे पूरा सफर सिर्फ चंद लम्हो ही का था ,स्टेशन पे विदा होते समय एक अजीब मायूसी थी, लग रहा था मानो कोई हमसे हमारा सब - कुछ लेके जा रहा है उसकी आँखों में भी एक अजीब सी नमी थी। इत्मीनान बस इतना ही था की अगली मुलाक़ात  की गुंजाइश बची हुई थी। और इन्ही अगली मुलाकातों ने उसे ज़िन्दगी भर के लिए मेरा हमसफ़र बना दिया। आज भी हम वो पहली मुलाक़ात और गोरखपुर से लखनऊ का सफर याद करके रोमांचित हो उठते है। 

आरम्भ - मैं और वो 
  

after valentine

किस्सा वैलेंटाइन डे के बाद का -  




हाँ तो आप लोगो को  वैलेंटाइन दिन वाले दिन तो हमारी और कमला की कहानी पता चली  थी , पर उसके बाद क्या हुआ इसको बताने में इतनी देर इस  वजह से हुई की भैया  अस्पताल से ठीक होने में थोड़ा टाइम लग गया। 

अब आप ये सोच रहे है  की हमारी कुटाई हो गई थी  तो बिलकुल सही सोच रहे है।  दरअसल वैलेंटाइन डे वाले दिन कमला को  देखते ही हमरे प्यार का थर्मामीटर इतना हाइ हो गया था की कमला को  सीट पे बैठाने  के बाद हमारी साइकिल की स्पीड 60 किलोमीटर / घंटा हो गई थी , और हम कुछ ही देर में शहर के गुरमुटिआ पार्क आ पहुंचे। पार्क लैला - मजनुओं से खचाखच  भरा हुआ था ,तरह - तरह के दिल के आकर वाले गुब्बारे हाथ में लेके लइका - लईकी  घूम रहे थे , हम तो सीधे कलेजा हथेली पे रखके आये थे अब  इतना तगड़ा बंदोबस्त होने के बाद इस तरह के पार्क में आना कलेजा हाथ में रखके आना ही तो  हुआ। हां तो पार्क में तरह - तरह के नमूने भी देखने को मिले कई ठो  ऐसे मिले की विश्वास हो गया की प्यार अँधा होता है अब हो काहे न एक खूबे सुन्दर लईकी बानर जइसे लइका के हाथ में हाथ डाले घूम रही थी देखे तो लइका का किनारे का बाल पूरा सफाचट था सिर्फ बीच में कुछ बचा था वो भी खड़ा। मेकअप तो इतना पोत के घूम रहीं  थी लोग की अगर भगवान् बरस जाते तो  हरी - हर घांस सफ़ेद हो जाती और चेहरा यूपी के सड़क जैसा। 

मुंह से जानू  - सोना  करके चाशनी इतना झर  रहा था की लगा की आज  के बाद प्यार  करने को ही नहीं मिलेगा। खैर हमको दुसरे से क्या करना था हमको लगा इहा ज्यादा देर रहना सुरक्षित नहीं इसलिए हम अपनी बुद्धि पे भरोसा करके उहा  से खिसक लिए और पहुँच गए गोलगप्पा खाने वहाँ पे भी उहे हाल जल्दी - जल्दी गोलगप्पा खाने के बाद  निरहुआ का एक ठो सिनेमा देखे चल दिए टिकट हम पहले ही खरीद लिए थे वो भी किनारे वाला। आज के दिन का पूरा प्लानिंग हम पहले ही कर लिए थे हाँ सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए  एक ठो  बुरका भी साथ लाये थे। फिलम शुरू होते ही हाल में सीटी और ताली का  आवाज शुरू हो गया  हम भी निश्चिंत होक कमला से बतियाने  लगे। लगा की आज पूरा   मेहनत स्वार्थ हो गया।


 तभी पता नहीं कहा से जोर - जोर से आवाज आने लगी देखे तो हमारी सिट्टी - पिट्टी  गुम , हाल पे बजरंग दल वाले पूरी बटालियन लेके आ गए थे उधर परदे पे निरहुआ का एक्शन सीन शुरू हुआ और  इहा हकीकत में ,बुर्का पहिनने का मौका भी नहीं मिला। सीन जबतक ख़तम हुआ तब - तक हमरा पुर्जा - पुर्जा हिल चुका था और मुंह से बस इहे  निकला  -  हे राम ...... 


मजेदार पढ़े    -  #वैलेंटाइन दिवस के पटाखे

 

main aur wo


main aur wo
मैं और वो 



हमारे वास्तविक जीवन में कई घटनाये ऐसी होती है जो अपनी छाप हमारे जीवन में छोड़ जाती है और कुछ ऐसी होती है जो हमारी दिशा ही बदल देती है। अक्सर इस बदलाव का कारण कोई और होता है और जब बदलाव का कारण कोई  लड़की  होती है तो  उसे हम वो से सम्बोधित करते है।  


main aur wo
main aur wo

इन्ही सारी  कश्मकश के बीच कुछ रूहानी यादें रह जाती है और कहानी शुरू होती है , इन कहानियो  में अक्सर ही दो पात्र प्रमुख होते है एक मैं और एक वो यानी " मैं और वो "


जल्द ही इस ब्लॉग पे  " मैं और वो " नामक एक नई कहानी सीरीज शुरू होने जा रही है । आप भी अपनी रचनाये मैं और वो सीरीज में भेज सकते है।  सोमवार को इस सीरीज की पहली कहानी प्रकाशित होगी. उम्मीद है आप सब को अवश्य पसंद आएगी अपनी प्रतिक्रियाएं इस सीरीज और ब्लॉग के प्रति अवश्य दे।  आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है।                                             


                                                                                                             रायजी 


मजेदार  -  

#वैलेंटाइन दिवस के पटाखे 


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modi vs modi

# नरेन्द्र मोदी बनाम ब्रांड मोदी - 2019 


कुछ भी कह दो पर पर बंदे मे है दम , जी हाँ  हम बात कर रहे है अपने वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी की वैसे तो मैं ना किसी दल का पक्ष लेता हू ना ही किसी भी दल के प्रति मेरी विशेष निष्ठा है , मैने कई मोर्चो पे मोदी जी से लेकर राहुल गाँधी तक सबकी आलोचना भी की है , पर आलोचना का मूल उद्देश्य किसी के प्रति दुराग्रह नही होता एक अच्छा आलोचक ही एक अच्छा हिमायती भी होता है .

rally pic
 चित्र साभार इंडियन एक्सप्रेस 

और लेखक को चाहिये की उसकी लेखनी मे किसी प्रकार का दुराग्रह और और अंधभक्ति ना हो , ये बात अलग है की किसी विषय मे जनता का क्या मत होता है और हमारे देश मे जहा अलग अलग विचार धारा के लोग है उनका किसी भी विषय मे अलग अलग मत हो सकता है . किसी को कुछ पसंद होता है और किसी को कुछ , आते है अब अपनी बात पे समाचर चैनलो पे देख रहा था की मोदी ओमान मे भारतीय समुदाय को संबोधित कर रहे थे उनका भव्य स्वागत और भारतीयो के बीच का उत्साह बताता है की बंदे मे कितना दम है . लाख आलोचनाओ के बाद भी अभी से 2019 मे मोदी की जीत पक्की है शंका केवल वही कर सकते है जिन्होने सच्चाई से मुंह मोड रखा है .

कारण मोदी के सापेक्ष मौजूदा परिदृश्य मे कोई ऐसा नेता नही दिखाई देता जिसपे जनता विश्वास कर सके भले ही लोग कहे की मोदी की लोकप्रियता कम हुई है फिर भी कुछ सीटे कम हो सकती है लेकिन 2019 मे भी मोदी सरकार ही रहेगी कारण सरकार की छवि पे एक भी दाग का ना होना , जिसमे संप्रग सरकार ने रिकॉर्ड तोड दिया था .

अन्य कारणो मे विदेशो मे भारत की बढ़ती धमक , हिन्दूवादी एजेंडा , कमजोर विपक्ष , और सरकार की निर्णय क्षमता ऐसे मुद्दे है जिनका लाभ मोदी सरकार को मिलेगा हालांकि बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे पे सरकार को नुकसान हो सकता है . मोदी सरकार के कुछ मंत्रियो और नेताओ का बड़बोलापन भी सरकार के हित मे नही है .पिच्छ्लि बार की तरह वोटो का ध्रुवीकरण कितना होगा और इसका लाभ किसे मिलेगा ए अभी कुछ कहा नही जा सकता . पर इन सबके बाद जो सबसे बड़ा मुद्दा है वो है मोदी .

इस बार के चुनाव मे विपक्ष मे कोई और नही मोदी खुद है , मोदी का मुकाबला कमजोर विपक्ष से ना होकर ब्रांड मोदी से है आज भी मोदी हारे हुए गुजरात को जीतकर भाजपा की झोली मे दे देते है उत्तर प्रदेश मे जहा राजनीतिक विश्लेक्षण धरे के धरे रह जाते है और और मोदी पे विश्वास करके जनता भाजपा की झोली मे उत्तर प्रदेश भी डाल देती है ए मोदी नही ब्रांड मोदी है. आने वाले चुनाव भी इसी ब्रांड को प्रचारित करके लड़े जाएं इससे इंकार नही किया जा सकता कर्नाटका , मध्यप्रदेश और राजस्थान ऐसे राज्य है जहा ब्रांड मोदी की एक बार फिर परीक्षा है . अभी लोकसभा चुनावो मे एक साल का समय और है .हो सकता है तबतक फिर हर घर मे ब्रांड मोदी देखने को मिले और हमे फिर से सुनाई दे।
             ” हर हर मोदी घर घर मोदी “

narendra modi vs rahul gandhi

नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी 



                       
narendra modi vs rahul gandhi

modi vs gandhi








ऐसा कौन सा नेता होता होगा जो अपने देश की मीडिया की तुलना मे अमेरिका की मीडिया मे ज्यादा सहज होता है वहा भी उसे अपनी छवि बदलने के लिये काफी मेहनत करनी पड़ी . कभी उसे अपनी ही सरकार के बिल जनता के सामने फाड़ने पड़े बाद मे पता चला की वो बिल ना होकर अपनी ही पार्टी का पर्चा था . कभी संसद मे खर्राटे लेना तो कभी अपनी ही पार्टी को बिना बताये गायब हो जाना . अब तक तो आप समझ गये होंगे की सारी भूमिका इस देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतीक संसद मे विपक्ष के नेता और सबसे पुराने दल कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गाँधी जी के बारे मे .

 राहुल गाँधी के विषय मे समझ मे नही आता ऐसी क्या मजबूरी है की पूरी कांग्रेस छानने के बाद अध्यक्ष की कुर्सी के लिये उनसे बेहतर उम्मीदवार नही मिला , जवाब सबको पता है राहुल गाँधी उसी वृक्ष की शाखा है जो प्रारंभ से ही इस देश पर राज करता आया है . वर्ना आजकल तो काबिलियत ना हो तो आप किसी निजी कम्पनी मे क्लर्क की नौकरी भी नही पा सकते प्रधानमंत्री बनना तो मुँगेरीलाल के सपने देखना है .




अब यदि आपको प्रधानमंत्री बनना है तो आप उम्मीदवार तो हो सकते है पर काबिलियत तो दिखानी ही होगी और आप की वजह से जहा दूसरे अनुभवी और काबिल नेता उम्मीदवार नही बन पाते इसका भरपूर लाभ विपक्ष को मिलता है जो उसे अत्यधिक मजबूत बनाता है . और जनता को उपलब्ध विकल्पो से ही काम चलाना पड़ता है . 
भाजपा के बाद कॉंग्रेस ही वर्तमान समय मे सर्वमान्य राष्‍ट्रीय पार्टी है जिसका अस्तित्व देश के प्रत्येक राज्य मे है पर एक मजबूत नेता के अभाव मे और परिवार के प्रति अन्य नेताओ की श्रद्धा इस पार्टी को दीमक की तरह खाती जा रही है समय है परिवारवाद से उपर उठ के सोचने का . एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक है वर्ना सत्ता के निरंकुश होने का भय बना रहता है . संप्रग-2 के शासन काल मे हुए घोटालो को जनता आज भी नही भूल पायी है रिमोट से सरकार को नियंत्रित करना किसी भी स्वस्थ समाज की जनता बर्दाश्त नही कर पाती है वैसा ही यहा भी हुआ और जनता ने एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने मे जोर - शोर से भागीदारी की और उसे मोदी की बातो मे एक ऐसे नेता की छवि दिखाई दी जो की जनता के तमाम दुखो को दूर कर अच्छे - दिन दिखला सकता है.

 लेकिन चार साल बीत जाने के बाद क्या विपक्ष मे इस बात का माद्दा है की वो जनता को समझा सके की वर्तमान सरकार ऐसा क्या कर रही है जिससे देश का खजाना खाली हो रहा है या खजाना भरने के चक्कर मे आम आदमी महंगाई और करो के बोझ से दबता चला जा रहा है, सरकार कितने वादो पर खरी उतरी है, शायद कमजोर विपक्ष को सरकार अपनी उगलियों पे नचा रही है और विपक्ष के पास मुद्दे होकर भी नही है .  


valentine day

#वैलेंटाइन दिवस के पटाखे  ( crackers of valentine day)


एक महीने से जिसका इन्तजार किये रहे और एक हफ्ते से जिसका  रोज छोटी दीपावली की तरह कोई न कोई डे रहता था ऊ  वेलेंटाइन डे आज आ ही गया।बेरोजगारी में   कसम से पैसा बचावे खातिर खैनी तक खाया छोड़ दिए रहे कितना बार त भन्सारी के दूकान के सामने से निकले पर खैनी की तरफ देखे भी नहीं। बस कमला का गेंदा की फूल की तरह खिला चेहरा देख के मन हरिहरा  जाता था। आजे  अपनी साइकिल में आगे एगो छोटका सीट लगवाए हैं  एही पे बैठाके  कमला को नहरी से लेके शहर वाला पारक में घुमाएंगे सुने है उहा तो मेला लगता है गुब्बारा से लेके चाट - गोलगप्पा सब मिलता है।  हमरी कमला को भी गोलगप्पा बहुत पसंद है उहो तीखा। 


काल्हिए साइकिल से शहर जाके कमला के लिए बढ़िया सा गिफ्ट लाये है अब बताएँगे नहीं की हम का लाये है 
इ बस हमरे और कमला के बीच की  बात है। हाँ पर  गिफ्ट के साथ चेंगु हलवाई की इमरती जरूर लाये है चेंगा की दूकान पे आज के दिन गजबे  का भीड़ था , हो काहे  नहीं उ से अच्छा मिठाई पूरा इलाका में कौन बनावत  है।  धक्का मुक्की में जरूर एक थो दांत निकल गया हमारा पर वो भी हमारी कमला से बढ़ के थोड़ी न था।  


पता नहीं काहे आज सुबह से इ फोनवे नहीं मिल रहा है और इ वैलेंटाइन डे का मुहूरत भी निकला जा रहा है। सोच रहे है एक बार साडी पहन के कमला के घरवे चले जाये कह देंगे अंकल आज शिवरात्रि पे मंदिर जाना है जल चढाने। पर इ मूंछ का का करेंगे कमला कही थी इ मूंछ ही त हमारी शान है और हमारे करिया चेहरे में एक मूंछ ही तो उसको पसंद है।  न .. थोड़ा देर और इन्तजार कर लेते है प्यार में इन्तजार का अलगे मजा है। 

valentine day rose
valentine day rose


हां पर आज बड़ा सावधानियों बरतना पड़ेगा पिछली बार तो खाली बजरंग दाल वाले ही हाथ में दू - दू  गो डंडा लेके घूम रहे थे इस बार तो जोगी एंटी रोमिओ वालो को ही लगा दिए है।  हमको लगता है की इन लोगो को तो कौनो लड़की पूछी नहीं , अब पूछती कईसे कंठी माला देख के तो इहे लगेगा की इ लोग साधू है  और शादियों के बाद मोदी जी जैसे संन्यास ले लिए तो हमरा  का होगा। एक थो महात्मा बड़ा ठीके कहे है " पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया  न कोई ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई " . 

लगता है कमला आ रही है अब हम चलते है क्योंकि हम नहीं चाहते की उ  इन्तजार करे जिससे प्यार किये है उसको कौनो तकलीफ हो तो कसम से कलेजा से रोआई छूटता है। और हां अपना भी ध्यान रखियेगा और हॉलमेट साथे लेके चलिएगा क्योंकि कौनो दल और कौनो सेना अरे भारतीय सेना नहीं करणी सेना टाइप 
आज के दिन हमरा और आपके ऊपर पटाखा फोड़ सकती है और हाँ  



              HAPPY VALENTINE DAY 

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population

भारत की जनसँख्या (population of India)






 स्टेशन पे खचाखच भरी रेल गाड़ी आते ही धक्का – मुक्की , गाली गलौच और झगड़े का दौर शुरु हो जाता है , दरवाजे तक लटके लोग और उसी डिब्बे मे चढ़ने के लिये लगी कतार , अंदर सांस लेने की जगह नही एक दूसरे के उपर चढ़े लोग . ये आम नजारा आपमे से अधिकांश लोगो ने देखा होगा महसूस इसलिये नही किया होगा की भई हमारे पास तो पैसा है .पहले से ही वातानुकूलित या शयनयान श्रेणी मे सीट आरक्षित करा रखी है . पर क्या चार दिन बाद या महीने बाद का आरक्षण भी आपको आसानी से मिल जाता है. 

crowd in india
bheed 

अब सडको को ही ले लीजिये हर साल लगभग 5 लाख दुर्घटनाए होती है और लगभग 1.5 लाख लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है . मैं खुद घर से बाहर निकलने पर भगवान से अपनी सलामती की दुआ मांगकर निकलता हूँ , क्योंकि हम अपनी गलती तो छोड़ दीजिये दूसरो की गलती का ज्यादा शिकार होते है . कल जिस सिंगल रोड पे आराम  से यात्रा हो जाती थी आज फोरलेन होने के बाद भी गाडियाँ जाम मे अपना समय और संसाधन दोनो बर्बाद कर रही है . देश की क्रियाशील जनसंख्या का अधिकांश समय जाम मे ही निकल जाता है . 

हर साल बढ़ती बेरोजगारो की फ़ौज , कृषि योग्य भूमि मे होती कमी , कंक्रीट के छतो की बढ़ती मांग , प्राकृतिक संसाधनो का तेजी से दोहन , मांग और पूर्ति मे बढ़ता अंतर , अधिकांश क्षेत्रो मे जल का अकाल क्या ये जनसंख्या विस्फोट का संकेत है या शायद होना शुरु हो चुका है .

एक घर मे यदि सद्स्यो की संख्या बढ़ने लगती है तो उसमे नये कक्ष का निर्माण या दूसरे जगह नया घर ही बना लिया जाता है . पर हम इस नयर धरा का निर्माण कहा से करेंगे . बांग्लादेश जनसंख्या विस्फोट का प्रमुख उदाहरण है रोहिन्ग्या शरणार्थी इसी का परिणाम थे . बांग्लादेश मे सडको पे पैदल चलने वालो की इतनी भीड़ रहती है की उनके लिये रेड और ग्रीन सिग्नल बने है . अभी तो संचार क्रांति ने कई जगहो पर लगने वाली कतार को कम कर दिया नही तो ज़िंदगी का 1/3 हिस्सा लाइनो मे ही निकल जाता .दिल्ली जैसे महानगरो मे तो सांस लेना भी दुश्वार हो गया है.

यही हाल रहा तो पूरे देश मे दिल्ली जैसी भयावह स्थिति होगी.बढ़ती जनसँख्या से हम अपने देश में प्रति व्यक्ति भोजन की गुणवत्ता को नहीं दे पाते जिस कारण  व्यक्ति के काम करने की क्षमता में कमी आती है। हमारे देश के संसाधन सीमित है तथा जनसँख्या बढ़ने पर उनपर दबाव पड़ना लाजिमी है ,उपलब्ध जनसँख्या भी रोजगार से लेकर संसाधनों को जुटाने तक तनाव ग्रस्त रहती है। एक तरफ जहा राजनीतिक पार्टियों द्वारा स्वयं की  स्वार्थ सिद्धि  और अपने - अपने वोट बैंक बढ़ाने हेतु इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है वही आने वाले चंद  सालो में ही इसके भीषण परिणाम देखने को मिलेंगे। 

फिलहाल मौजूदा महंगाई को देखते हुए एक बच्चे का भरण पोषण बेहतर तरीके से हो जाये वर्तमान समय में यही बेहतर है , सरकार करे चाहे न करे लेकिन आम आदमी अपनी समस्या को देखते हुए और होने वाले बच्चे के उज्जवल भविष्य हेतु वही कार्य करेगा जो उसके हित  में है। 

"क्योंकि छोटा परिवार सुखी परिवार "

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spirituality part2

Adhyatmikta -  jeewan ki aawashyakta   

आध्यात्मिकता -  जीवन की आवश्यकता 

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में सर्वप्रथम आध्यात्मिकता के विषय में विस्तार से चर्चा की थी  . वर्तमान जीवन की भागदौड़ , रिश्तो की आपाधापी  और जीवन की अस्थिरता मानसिक विचलन का प्रमुख कारण है। आध्यात्मिकता एक ऐसा माध्यम है जिससे इन सारी  समस्याओ का निवारण हो सकता है।  अगर हम अध्यात्म में कच्चे है तो अनेक ऐसे श्रेष्ठ गुरु है जिनकी शरण में और मार्गदर्शन लेकर हम इस पथ पर आगे बढ़ सकते है। 



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adhyatmikta 


क्या है आध्यात्मिकता (what is spirituality) -  

आध्यात्मिकता ज्ञान की वह शाखा है  जो संसार की वास्तविकता से हमारा साक्षात्कार कराती है और ईश्वर और हमारे बीच समबन्ध स्थापित करती है। आध्यात्मिकता को किसी धर्म विशेष से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है।  अध्यात्म में समूर्ण सृष्टि का  संचालन कर्ता एक ही सर्वशक्ति को माना  गया है. अध्यात्म का प्रारम्भ मन की चेतना से  होता है. जिसमे सर्वप्रथम मन के विकारो को दूर करना और सांसारिक या भौतिक निश्चेतना से  परलौकिक चेतना   की ओर बढ़ना है। 

आध्यात्मिकता और मनोविज्ञान (spirituality and psychology) - 

आधुनिक वैज्ञानिको ने आध्यात्मिकता को मनोविज्ञान से जोड़कर देखा है उनका मानना है की अध्यात्म एक सकारात्मक मनोविज्ञान है जो मनुष्य को निराशा के छड़ो से निकालकर आशा को ओर ले जाता है , जीवन के कठिन छड़ो  में उसका विश्वास ईश्वर और उसके न्याय व्यवस्था पे बनाये रखता है जिससे वह कठिन छड़ो में  भी सकारात्मकता के साथ  खड़ा रहता है। उसे संसार का  भौतिक ज्ञान हो जाता है। अगर मनुष्य के कठिन क्षड़ों  में पूरा संसार उसके विपरीत खड़ा हो या उसका साथ छोड के चला जाये तो यही विश्वास उसकी ताकत बनता है. 

अध्यात्म हमें भौतिक ज्ञान से आत्मीय ज्ञान का अनुभव कराता  है जिसमे हम अपनी आत्मा से भली भांति परिचित होते है। 
शेष अगले अंश में। ....  

   

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vinash kale vipreet buddhi in hindi

विनाश काले  विपरीत बुद्धि  

आज से 200 साल पहले समाज मे बाल विवाह , सती प्रथा जैसी अनेक कुप्रथायें विद्यमान थी . राजा राम मोहन राय द्वारा इन कुप्रथाओ के खिलाफ आवाज उठाई गई . उन्हे भारी विरोध का सामना करना पड़ा ,अनेक धर्मगुरुओ ने उन्हे जान से मरवाने की धमकी तक दे डाली पर पर उन्होने वही किया जो समाज और मानवता के लिये आवश्यक था . 
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अँधेरा 

भारतीय समाज अपने विकास की ओर अग्रसर है . पर एक विकसित समाज ऐसी सत्ता के लिये घातक है . जिसका उद्देश्य सामाजिक कुरीतियो और स्वार्थी समूहो के सहयोग से अपनी सत्ता बनाये रखना है . संसार मे प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है . जो परिवर्तित नही होता है वो अपनी महत्ता खो बैठता है. आर्यो के आगमन से लेकर अंग्रेजो की ग़ुलामी तक भारत ने अनेको उतार चढाव देखे है , हर काल एक विशेष नाम से जाना जाता है . जो उस काल की विशेषता इंगित करता है .

वर्तमान भारतीय समाज के लिये मुझे कुछ कहना होगा तो में सिर्फ यही कहूँगा "चाहे वो परिवार हो या सरकार सब स्वार्थ , धन और सत्ता के खेल मे लीन है " .

सहयोग , भाईचारा , अपनत्व , दया , क्षमा सहनशीलता जैसे गुणो का समाज से निरंतर हास् होते जा रहा है. रिश्ते शर्मशार हो रहे है . वास्तव मे पुराणो के अनुसार कलियुग की शुरुआत हो चुकी है तो इसका अंत कितना भयावह होगा कल्पना से परे है . यदि समाज विकास की ओर अग्रसर है तो ये कैसा सामाजिक विकास है जहां घर के बुजुर्गो को एक बोझ की तरह समझा जाने लगा है , जहां पड़ोस मे रहने वाले एक अजनबी है , जहां रिश्ते ही रिश्तो को कलंकित करते जा रहे है , जहा बहू बेटिया घर के बाहर से लेकर अंदर तक असुरक्षित है . जहां बेटा खुद बाप बन बैठा है . जहां पैसा ही ईमान ,धर्म और आदमी की पहचान बन चुका है और इंसान एक मशीन . और मशीन सोचा कहा करती है , कहते है की इंसान के  अंदर क्रोध की भावना जितना अधिक बढ़ते जाएगी कलियुग उतना ही करीब आते जायेगा। इंसान और मशीन में फर्क करना मुश्किल हो जायेगा उसकी बुद्धि और विवेक दोनों ही निष्क्रिय हो जायेंगे। 

पति और पत्नी का  सम्बन्ध नाम मात्र का रह जायेगा दोनों ही एक दुसरे के विश्वास पात्र नहीं रह जायेंगे। बुद्धि ही इंसान को भ्रमित करने लगेगी और अपनी बुद्धि से नियंत्रण खो देगा.पुराणों में कुछ इसी प्रकार कलियुग की शुरुआत की बात कही गई है और कहा गया है की इसी समय भगवान् श्रीकृष्ण का कल्कि अवतार धरती पर अवतरित होगा।  उसके पश्चात् सम्पूर्ण धरती जलमग्न हो जाएगी। और १५००० वर्ष की रिक्ति के बाद धरती पे सतयुग की शुरुआत होगी। 
वर्तमान समय की परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लगता है की जिस प्रकार मनुष्य छोटी छोटी बातों में अपना आप खोते जा रहा है धन के पीछे अपनों का ही गाला काटने को आतुर है और उसकी सारी  चारित्रिक विशेषताएं नष्ट होते जा रही है कलियुग की शुरुआत  हो चुकी  है। अब तो बस इस विनाश काल की शुरुआत में ईश्वर भक्ति में लीन  होकर दुषग्रहो के प्रभाव से अपनी बुद्धि और  विवेक की सलामती की दुआ ईश्वर से मांगनी चाहिए।    

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अध्यात्म की शुरुआत 


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अध्यात्म की शुरुआत 

अध्यात्म हमारे भीतर की वह चेतना है जो की निष्काम है उसी चेतना को जगाने का प्रयास ही  अध्यात्म  कहलाता।  मनुष्य जन्म कई लाख योनियों में जन्म लेने के पश्चात मिलता है इस जन्म की सार्थकता को प्रत्येक व्यक्ति नहीं समझते और भोग - विलास की प्रवृत्तियों में जीवन का सम्पूर्ण भाग निकल देते है वे भूल जाते है की शरीर नश्वर है जो अमर है वो है आत्मा। जीवन एक प्रक्रिया है इस धरती पर जन्म के साथ ही यह शुरू हो जाती है और अटल सत्य मृत्यु के साथ ख़त्म चाहे वो राजा हो या रंक  प्रकृति किसी के साथ भेदभाव नहीं करती।
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अध्यात्म 

सूर्य की रौशनी सबपर एक सामान भाव से पड़ती है , वायु का प्रवाह भी सामान ही होता है , यहाँ कुछ भी वास्तविक नहीं है जिसके पीछे हम अपना समय नष्ट करते है जिस सुख के पीछे हम दिन रात भागते है वो शारीरिक और क्षणिक है , वास्तविक सुख का अनुभव हमारी आत्मा को होता है। किसी नगर में एक बार कुछ लोग सड़क  पे चले जा रहे थे उनको देख कुछ और उनके पीछे चलने लगे सबको लगने लगा की अवश्य ही कुछ विशेष बात है इस प्रकार भीड़ अत्यधिक बढ़ गई अंत में पता चला की वे लोग इस शहर में नए थे और मार्ग से विचलित हो गए थे उनका अनुशरण करने वाले हजारो लोगो का समय और ऊर्जा बिना किसी बात के ही व्यर्थ चला गया।  कुछ लोग ऐसे भी थे जो समझदार थे और वे अपने नित्य के कामो में ही लगे  रहे। कहने का तात्पर्य ये है की यदि समाज का बड़ा वर्ग या पूरा समाज ही गलत दिशा अर्थात भौतिक सुख के पीछे भाग रहा है तो ये आवश्यक नहीं की हम भी उसके पीछे भागे।  वर्तमान समय में राजनीति ,सत्ता ,धन और भौतिक सुख के पीछे भागने वालो की संख्या सर्वाधिक है पर क्या वे मानसिक रूप से सुखी है ? 

भारतीय समाज में भी वैदिक काल से ही पुरुषार्थ की धारणा चली आ रही है जिसके अंतर्गत पुरुषार्थ  करते हुए जीवन व्यतीत करने वाला पुरुष ही सर्वोत्तम होता है।  पुरुषार्थ के अंतर्गत चार श्रेणियाँ होती है धर्म , अर्थ ,काम ,और मोक्ष। अंतिम मोक्ष की प्राप्ति है जिसमे जीवन के अंत काल में सर्वस्य त्याग कर ईश्वर की भक्ति में लीन  होते हुए  अपने अंश को ईश्वर के अंश में समाहित करना है। 

बचपन से लेकर जवानी और जवानी से लेकर बुढ़ापे तक जीवन चक्र अलग अलग अवस्थाओं से गुजरता है।  जहां हम इस मोह रूपी संसार के मायाजाल में फंसकर अनर्गल कार्यो में ही जीवन का वास्तविक सुख और उद्देश्य दोनों ही भूल जाते है। अध्यात्म वही चेतना है जो हमें वास्तविक सुख के प्रति जागृत करती है।  मन से तमाम तरह की बुराइयों को निकाल बहार फेंकती है जिससे एक स्वच्छ मन में ईश्वर का वास हो सके और हमारे और हमारे सर्वशक्तिमान परम पिता के बीच अटूट संपर्क स्थापित हो सके यही अध्यात्म की शुरुआत है बाकी बाते अगले अंश में........ 
              
 अगला भाग -  

आध्यात्मिकता -  जीवन की आवश्यकता

 

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fenku uncle

फेंकू चच्चा 


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fenku uncle 


मारे गाँव मे एक ठो चच्चा हुआ करते थे फेंकू चच्चा . उनके फेंकने के किस्से दूर – दूर तक मशहूर थे . दूर – से मतलब अमेरिका से नही हाँ आसपास के गाँव, रिश्तेदारियो और जवार मे , चच्चा जब कभी रिश्तेदारियो मे जाते तो उनके आसपास भीड़ का रेला लग जाता था उनकी बातों के दीवाने घर के बच्चो से लेकर बूढ़े बुजुर्ग तक सभी थे . चच्चा अक्सर ही भ्रमण पे जाया करते थे थोड़ा घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के थे . वापस लौटकर आने पर बातों का भंडार रहता था .


चच्चा एक बार बता रहे थे की कैसे रास्ते मे उन्हे शेर मिल गया था , चच्चा उसे देखकर बिल्कुल भी नही डरे बल्कि शेर चच्चा को देखते ही उनके आगे नतमस्तक हो गया और पूरे जंगल मे उनके पीछे – पीछे घूमते रहा चच्चा उसे पालतू बनाकर घर ले आने लगे पर गाँव वाले उसे देखकर कही डर से मर ना जाये इसीलिये समाजहित मे उसे जंगल मे ही छोड़ आये . हम बच्चे जब तक छोटे थे तब तक चच्चा की कहानियो को सही मानते थे . जैसे की चच्चा बताते की उन्होने ही गब्बर सिंह को पकड के फिल्म शोले मे दिया था जिससे अमिताभ बच्चन उनका फैन हो गया था. अपनी जवानी मे वो सेना मे थे और उन्होने कैसे पाकिस्तान की नाक मे दम कर दिया था उनको देखते ही पाकिस्तानी डर के भाग खड़े होते थे .



चीनी तो उनको देखते ही हिन्दी बोलना शुरु कर देते थे . अमेरिका तक मे उनके चर्चे थे , एक बार हमने पूछ  ही दिया तब तो चच्चा इतिहास की किताबो मे आपका नाम जरूर होगा चच्चा बोले की वे नही चाहते थे की पाकिस्तानी और चीनी बच्चे उनके बारे मे पढ के पैंट गीला करदे भला इनमे बच्चो का क्या दोष . ऐसे लोगो की भी संख्या अधिक थी जिन्हे चच्चा और उनकी कहानियों पर पूर्ण निष्ठा थी . और वे चच्चा के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नही थे . चच्चा की फ्रेंड फालोविंग भी बड़ी लम्बी चौड़ी थी इसका करण था की चच्चा से बढिया मनोरंजन और मसाला फिल्मो के पास भी नही होता था .

और चच्चा की शैली मे लोगो को बांधे रखने की छ्मता थी वो वही सुनाते जो लोग सुनना चाहते थे , करना चाहते थे चाहे वो कल्पना मे ही क्यो ना हो . इधर गाँव मे प्रधानी के चुनावो की घोषणा हुई उधर चच्चा के चौपाल का दायरा बढ़ता गया . चच्चा को इस से बढिया मौका कहा मिलता अपनी काबिलयत दिखाने का सो वो भी चुनाव मे खड़े हो गये . चच्चा मे भीड़ जुटाने की काबिलियत तो थी ही सो उन्होने फिर अपनी बातो का मायाजाल फैलाना शुरु कर दिया , सबको लगा कुछ हो चाहे ना हो चच्चा का दिल नही दुखाना चाहिये नही तो बिना बिजली , सड़क के इस गाँव मे हमारा समय कैसे व्यतीत होगा औरतो को लगा की अगर चच्चा हार गये तो मर्द दिन रात घर मे पड़े उन्हे ही परेशन करते रहेंगे , बच्चो ने तो साफ – साफ कह दिया था की अगर उनके घर से चच्चा को वोट नही मिला तो वो भूख हड़ताल पे चले जायेंगे , तब – तब क्या चच्चा प्रधान हो गये . आज भी गाँव मे चच्चा के किस्सो के साथ चाय – पकौडो से ही लोगो का टाइम पास होता है .


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चाय और पकौड़ा 



शाम के समय एक मित्र के साथ में चाय – पकौड़े की पार्टी मे गया हुआ था, पार्टी एक रेस्टोरेन्ट मे थी जहा अन्य मित्र भी आये हुए थे . फरमाइश के अनुसार अलग अलग प्रकार के पकौडो का ऑर्डर हुआ , किसी को पनीर पसंद था तो किसी को प्याज के पकौड़े किसी को गोभी के पसंद थे तो किसी को पालक के . रेस्टोरेन्ट खचाखच भरा हुआ था . अनेक विदेशी सैलानी भी पकौडो को देखने और चखने आ रहे थे . वो रेस्टोरेन्ट वाले से मोदी के पकौड़े दिखाने की बात कर रहे थे उनकी बात चीत से लग रहा था की वी मोदी को पकौडो का ब्रांड अंबेसडर समझने लगे थे . वहा के एक वेटर ने बताया की जबसे मोदी जी ने पकौडो की बात की तबसे लोग उससे अलग अलग तरह के पकौड़े सीखने के लिये भीड़ लगने लगे . 


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पकौर स्टाल इन कर्नाटका 

मीडिया वाले उसकी आमदनी जानने मे ज्यादा इच्छुक हो गये थे . बाहर निकलने पर एक मित्र ने बताया की वो किसी अच्छे लोकशन की तलाश कर रहा है ताकि वो एक पकौड़े का स्टाल लगा सके . ठेले और स्टाल बनाने वालो के पास अचानक ही ग्राहको की भीड़ बढ गई . मुझे अब लगने लगा था की पकौड़े को एक राष्‍ट्रीय व्यंजन घोषित कर देना चाहिये सरकार को भी इसके स्टार्टअप पर सब्सिडी देना चाहिये . हर आफिस के बाहर वाटर प्रूफ पकौड़े के स्टाल बनाकर बेरोजगरो को देना चाहिये .

 में तो कहता हूँ इसमे भी आरक्षण लगा देना चाहिये , पनीर ब्रेड और मच्छी के पकौड़े केवल एससी वाले ही बनायेंगे जबकि गोभी और अन्य सब्जियो के पिछड़ी वाले , सामान्य वालो को केवल चाय बनाने को मिलेगा वो भी नीबू वाली . आइ आइ टी मे तो पकौड़े की मेकिंग को लेकर एक इंजीनियरिंग की डीग्री ही बना देनी चाहिये . बल्कि इसको कौशल विकास योजना मे भी शामिल करना चाहिये .आगे  बढ़ने पर कई आइ आइ एम के शोधार्थी पकौडो के स्टाल मे चटनी और पकौड़े के साथ अपना शोध ग्रंथ पूर्ण करने मे लगे हुए थे . मुझे लगता है की अब हमारे देश मे बेरोजगारी की समस्या जल्द ही खत्म होके रहेगी और भारत सम्पूर्ण विश्‍व मे पकौड़े को वैश्‍विक रोजगार के रूप मे स्थापित करने वाले देश के रूप मे जाना जायेगा . और मोदी उस देश के नेता …


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ज़िन्दा थे तो बे बेनूर थे और मारके कोहिनूर बना दिया हुक्मराणो ने रायजी. . सब तो चले गये जहाँन से पर स्वर्ग मे दरबारियों ने जाति ना पुच्छी .


अंग्रेजो को जब लग गया की भारत मे रहना अब उनके बस की बात नही है और व़े अधिक दिनो तक अपना नियंत्रण नही बनाये रख सकते तो उन्होने सामरिक महत्व की इस धरती को बांटने का फैसला किया . भारत की जनता से बड़ा और ताकतवर विरोधी उसके सामने कोई नही था . उन्होने उसमे सेध लगाने के लिये अपने अधिकरिओ से रिपोर्ट मांगी उन्होने बताया की धर्म ही ऐसा एक मुद्दा है जो की भारतीय समाज की जडो मे गहराई तक विद्यमान है. यहाँ के लोग धर्म गुरुओ की बातों पर आंख मूंद कर विस्वास करते है . डाक्टरो से ज्यादा भीड़ ओझओ और सोखाओ के पास रहती है . पर यहाँ जातियॉ मे कोई वैमनस्य नही है सबके कार्य क्षेत्र बंटे हुए है और सब अपना त्योहार मिलजुल कर मानते है . यहाँ दरगाहो पे हिन्दू और मुस्लिम दोनो ही सजदे मे सिर् झुकते है. एक दूसरे की शादियों से लेकर गांवो मे पड़ने वाले हर सामूहिक समारोहो मे भी भाग लेते है . अंगेरेजो ने अपना पूरा शोध करने के बाद पाया की केवल धर्म ही ऐसा मुद्दा है जिससे इनमे फुट डाला जा सकता है . उस समय संचार के साधन नही के बराबर होते थे. पत्रकारिता व्यापार ना होकर समाज सेवा का माध्यम थी जिसे अनुदान द्वारा संचालित किया जाता था . उस पर भी अंग्रेज़ी सरकार द्वारा कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये जाते थे. जिनसे समाचर पात्रो का चोरी – चुपके संचालन होता था . लोग भी शिक्षित नही होते थे गाँव मे कोई एक ही ऐसा आदमी होता था जो अखबार पढ पाता था इस करण सब लोग एक जगह इकट्ठा होकर समाचर सुना करते थे और उस पर चर्चा किया करते थे . ग़ुलाम भारत केवल अंग्रेजो का ग़ुलाम था ना की अपनी घृणित मानसिकता का . अग्रेजो ने भारतीयो की धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वासो का भरपूर फायदा उठाया और उनमे फुट डालने मे कामयाब हो गये जाते जाते उन्होने दुनिया मे अहिंसा के जनक गाँधी के भारत मे ऐसी हिंसा को जन्म दिया जिसने सम्पूर्ण मानवता को शर्मशार कर दिया . अंग्रेजो द्वारा बोयो गये इस बीज को भारतीय राजनेताओ ने अपने अपने तरीके से सींचा और उसकी अनेको नई प्रजातियाँ तैयार की किसी ने दलित का पौधा बनाया तो किसी ने सवर्ण का तो किसी ने पिछड़ी का ,
हिन्दू और मुसलमान का तो विशालकाय वृक्ष ही खड़ा कर दिया , और हम कहते है ” एक भारत अखंड भारत "


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Pappu paas ho gaya



पप्पू पास हो गया 


मैं  और पप्पू बचपन से ही एक साथ स्कूल मे  पढ़ते आये थे , शुरुआत मे जब पप्पू चौथी कक्षा का विद्यार्थी था  तभी मैने  विद्यालय मे दाखिला लिया था . मेरे चौथी कक्षा मे आने तक पप्पू ने मेरा इंतजार बड़ी बेसब्री से किया था . हालांकि पप्पू के एक दो सब्जेक्ट को छोड़ कर बाकी सबमे 0 नंबर ही थे . पर पप्पू हार मानने
pappu
pappu
वालो मे से नही था, हर बार कम नंबर आने के बाद वो कड़ी साधना मे जुट जाता था . पर  साधना करने के लिये उसे अपना घर उपुक्त नही लगता इसलिये वो अपने मामा के घर शिमला  या मौसी के पास  मसूरी चला जाता था. 

पप्पू जब लौट के वापस आता तो उसकी साधना उसके चेहरे से सॉफ झलकती थी , हाँ  तो मुझे याद है की जब मैं कक्षा चार मे पहुँचा तो सरकार की तरफ से एक नई शिक्षा नीति आ गई की आठवीं तक के किसी विद्यार्थी को फेल नही किया जायेगा, मैं बड़ा प्रसन्न हुआ , मुझे लगा की जरूर पप्पू की साधना का फल है जो भगवान के साथ सरकार ने भी सून ली .

अब तो में भी पप्पू का मुरीद हो गया और पप्पू के साथ अपनी घनिष्टता बढ़ा ली . पप्पू अपने लंच बॉक्स मे हमेशा मूली के परांठे और मिर्चे का आचार लाया करता था . वो कहता था की मिर्च से गला सॉफ होता है और मूली से पेट . अक्सर लंच के बाद पूरी कक्षा के विद्यार्थी अपने नाक पे रूमाल लगा लिया करते थे शायद कही से विषैली गैस का  रिसाव होने लगता .

आठवी कक्षा के बाद नौवी कक्षा मे अचानक से पप्पू के अंदर प्रवचन देने की प्रवित्ति उतपन्न हो गई मुझे लगा शायद मिर्चे ने पप्पू का गला कुछ ज्यादा ही सुरीला बना दिया था , कई बार क्लास की लड़कियां कन्फ्यूज हो जाती . पर पप्पू के प्रवचन मे आंकड़े अक्सर ही इधर से उधर हो जाया करते थे कभी अकबर  की रानी अलीजाबेथ हो जाती तो कभी पप्पू बाबर का युद्ध सम्राट अशोक से करा देता.

पर इन सबमे पप्पू का कोई दोष नही था सब गलती किताबो की थी जिनमे इतने रानी राजाओ का जिक्र था , इसी से खिसिया के एक बार तो पप्पू ने  किताब ही फाड़ दी  जबकि अगले दिन उसी विषय की परीक्षा थी .बेचारा पप्पू किताब की वजह से  फिर फेल हो गया और मैं पास होके अगली कक्षा मे पहुंच गया ,उसके बाद तो कभी - कभी ही पप्पू से मुलाकात हो पाती थी. पर पप्पू के चर्चे जरूर सुनने को मिलते थे , समय का पहिया चलते गया और  पढ़ाई पूरी करने के बाद  आम आदमी की तरह मैं भी  नौकरी मे लग गया. पर पप्पू ने उसी विद्यालय मे ही मन लगा लिया था .
इधर कुछ दिनो से पप्पू का ज़िक्र अचानक ही  बढ गया  था , कई लोगो ने बताया की पप्पू अपने अमेरिका वाले फूफा के यहाँ गया था वहा उन्होने अनेक विद्वान लोगो से उसकी मुलाकात कराई पप्पू से बहुत से प्रवचन दिलवाये जिससे पप्पू वहा अपना झंडा गाड़ के आया है. यहाँ आने पे पप्पू मे फिर से नई उर्जा झलकने लगी थी और इस बार पप्पू ने बिहार से फार्म भरकर हाइ स्कूल की  परीक्षा न केवल  पास कर ली  बल्कि पूरा बिहार ही  टॉप कर दिया . 
  

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                                                                        comman man

Ab to achhe din dikhla do sarkar

अच्छे दिनों की आस में 


बड़ी मुश्किल से एक एक रुपया जोड़कर 4 जी मोबाइल के लिये पैसा जमा किया था मोदी सरकार ने वो भी तोड़ दिया , लगा क‍ि अच्छे दिन की तरह 4 जी मोबाइल के लिये अभी कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा , दिन भर टी वी पर सिर खपाने के बाद निष्कर्ष निकला क‍ि बजट कुछ समझ में नहीं आया , आखिर सरकार ने आम आदमी को राहत दिया है या हमेशा की तरह देश की जीडीपी की दुहाई देकर उसकी बैंड बजाई है।

 सरकार से निवेदन है क‍ि कभी कभी धरातल पे उतरके आम इंसानों की जिंदगी की जीडीपी भी समझ लिया करो। कभी कभी तो लगता है क‍ि सरकार, सरकार ना होकर एक फाइनेंशियल इन्स्टिट्यूट होकर रह गई है जिसका काम बस लोगों का खाता खुलवाने से लेकर बीमा करने तक रह गया है ए बिल्कुल वैसा ही है जैसे मुर्गी को दाना डालकर हलाल करना . गरीब आदमी जिसका मुफ्त मे खाता खुलवा कर सब्सिडी के कुछ पैसे डालकर फिर उन्ही पैसो को बैंक द्वारा मिनिमम बॅलेन्स के नाम पे काट लिया जाता है।

 ऐसा करके लगभग 1700 करोड़ रुपया बांको द्वारा गरीबो से वसूला गया. समझाने के लिये इतना ही काफी है गरीब को सब्सिडी का पैसा पाने के लिये बैंक मे खाता खुलवाना और उसे आधार से लिंक करना आवश्यक है ये उसकी मजबूरी है , अगर उसके पास मिनिमम बॅलेन्स इतना भी पैसा नही है तो क्यो नही उसका खाता बंद करके उसको पूर्व की भांती सब्सिडी जारी रखी जाये , और उससे भुगतान के समय ही राहत प्रदान की जाये . अगर उसके पास इतना ही पैसा रहता तो वो गरीब ही क्यो कहलाता . 

pakoura
pakoura 

हाँ तो आते है अब बजट पे तो इस बार सरकार कहा पीछे रहने वाली थी , बीमा दिया इन्होने…. किसानो को , स्वास्थ्य का भी बीमा दिया . पर उसके लिये तो बीमार पड़ना पड़ेगा इनके टर्म एंड कंडीशन मानने पडेंगे . सेस को बढ़ा दिया जिससे विभिन्न प्रकार की शिक्षा और स्वास्थ्य बिलों के दाम बढ़ेंगे समझ में नही आता एक देश एक टैक्स का नारा कहा गया . कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी गई . जेटली जी के विषय मे एक बात कहना चाहूंगा क्या वकालत के सिवा उन्हे अर्थशास्त्र मे भी महारत हासिल है .

 सुब्रमण्यम स्वामी ने शुरु मे ही इनकी काबलियत जग जाहिर कर दी थी पर अपनी राजनीतिक कुशलता से जनता द्वारा नकारे जाने के बाद भी इस देश के वित्तमंत्री है . मीडिया से भी अनुरोध है क‍ि वो केवल चुनाव के समय ही नही बल्कि अपनी दैनिक रिपोर्टिंग में सरकार की विभिन्न योजनाओं की जमीनी स्तर पे निष्पक्ष भाव से विवेचना करे . ताकि हम भी जान सकें क‍ि सरकार अपने चुनावी वादों में कितनी खरी उतरी है. फिलहाल इस आम बजट में कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिससे आम जनता, और निचले तबके के लोग राहत महसूस कर सकें..


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